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LYRIC_DUSHYANT KUMAR_HO GAYI HAI PEER_ हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

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HO GAI PEER PARWAT SI_DUSHYANT KUMAR   हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए , इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार , परदों की तरह हिलने लगी , शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर , हर गली में , हर नगर , हर गाँव में , हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं , सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही , हो कहीं भी आग , लेकिन आग जलनी चाहिए। - दुष्यन्त कुमार    

AAJ KI SHAYARI-25-04-2026

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हम तुम्हें मुफ़्त में जो मिले हैं... क़दर ना करना हक़ है तुम्हारा... ---- तेरी दास्ताँ-ए- हयात को लिखूं किस गजल के नाम सा, तेरी शोखियाँ भी अजीब, तेरी सादगी भी कमाल... --- मुझें छोड़कर वो खुश हैं, तो शिकायत कैसी, अब मैं उन्हें खुश भी न देखूं तो मोहब्बत कैसी !! ---- मैं खुद में ढूंढता हूँ बहोत मुझको, पर हर बार कोई और मिल जाता है।।  ---- ख़्वाहिश ऐसी कि आसमान तक जा सको ! दुआ ऐसी कि ख़ुदा  को पा सको !! जीने के लिए पल बहुत कम है ! जियो ऐसे कि हर पल मे जिंदगी पा सको !! ~ डी सी पांडे "नज़र" ----- नज़र से अपनी नज़र क्या मिला गया कोई ! तमाम उम्र को अपना बना गया कोई !! मुझे शराब कि ख़्वाहिश नहीं रही साक़ी ! नज़र मिला के नज़र से पिला गया कोई !! ~ डी सी पांडे नज़र ---- यूं न रह रह कर हमे तड़पाइये ! आइये आ जाइए !! क्यूंकि मेरी दुनिया मुंतज़िर है आपकी ! अपनी दुनिया छोड़ कर आ जाइए !! ---- तेरा दीवाना तुझे याद किया करता है ! हक़ मोहब्बत का बहरहाल अदा करता है !! हारता है कभी दामन को सिया करता है ! नाम लेता है तेरा और जिया करता है !! ---- पहले माहौल मोहब्बत का बनाया जाये ! फिर कोई शेर मेरा सुनाया जाये !! रा...

AARZOO-E-HAZAR RAKHTE HAIN_आरज़ूएँ हज़ार रखते हैं_LYRIC_MEER TAQI MEER

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AARZU-E-HAZAR RAKHTE HAIN_MEER TAQI MEER   आरज़ूएँ हज़ार रखते हैं तो भी हम दिल को मार रखते हैं बर्क़ कम-हौला है हम भी तो दिलक-ए-बे-क़रार रखते हैं ग़ैर ही मूरिद-ए-इनायत है हम भी तो तुम से प्यार रखते हैं न निगह ने पयाम ने वा'दा नाम को हम भी यार रखते हैं हम से ख़ुश-ज़मज़मा कहाँ यूँ तो लब ओ लहजा हज़ार रखते हैं चोट्टे दिल के हैं बुताँ मशहूर बस यही ए'तिबार रखते हैं फिर भी करते हैं 'मीर' साहब इश्क़ हैं जवाँ इख़्तियार रखते हैं --- मीर तक़ी मीर

AAP KA AITBAR KAUR KARE_आपका एतबार कौन करे_DAAG DEHALVI_LYRIC

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AAP KA AITBAR KAUN KARE_DAAG   आप का ए ' तिबार कौन करे रोज़ का इंतिज़ार कौन करे   ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा तो हम करते पर तुम्हें शर्मसार कौन करे   हो जो उस चश्म-ए-मस्त से बे-ख़ुद फिर उसे होशियार कौन करे   तुम तो हो जान इक ज़माने की जान तुम पर निसार कौन करे   अपनी तस्बीह रहने दे ज़ाहिद दाना दाना शुमार कौन करे   हिज्र में ज़हर खा के मर जाऊँ मौत का इंतिज़ार कौन करे   वा ' दा करते नहीं ये कहते हैं तुझ को उम्मीद-वार कौन करे   ' दाग़ ' की शक्ल देख कर बोले ऐसी सूरत को प्यार कौन करे -----  

LYRIC- HALKA HALKA SURU HAI SAQI SHAYAR SHEK ABDUL HAMEED 'ADAM'

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HALKA HALKA SURU HAI SAQI_ABDUL HAMID ADAM हल्का हल्का सुरूर है साक़ी बात कोई ज़रूर है साक़ी तेरी आँखें किसी को क्या देंगी अपना अपना सुरूर है साक़ी तेरी आँखों को कर दिया सज्दा मेरा पहला क़ुसूर है साक़ी तेरे रुख़ पर है ये परेशां ज़ुल्फ़ें   इक अँधेरे में नूर है साक़ी पीने वालों को भी नहीं मालूम मय-कदा कितनी दूर है साक़ी ---- शायर : अब्दुल हमीद अदम 
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GHAMO KI BHEED KHADI HAI_CHANDAN DAS_   शराब ग़म की दवा है शराब पीने दे , ज़माना मुझसे ख़फ़ा है , शराब पीने दे ! खुलेगा अब्र तो हम भी नमाज़ पढ़ लेंगे , अभी तो काली घटा है शराब पीने दे ! ---- ग़मो की भीड़ खड़ी है चलो शराब पीये , ये इम्तिहाँ की घड़ी है चलो शराब पीएं ! ग़मो की भीड़ खड़ी है चलो शराब पियें ----- ये थोड़ी देर के मिलने बिछड़ने का ग़म क्यूँ - 3 तमाम उम्र पड़ी है चलो शराब पियें ! ये इम्तिहाँ की घड़ी है चलो शराब पीएं ! ग़मो की भीड़ खड़ी है चलो शराब पियें ----- उदासियों में इन्हें चाँद तारे मत समझो- 3 ये आंसुओं की -२ लड़ी है चलो शराब पियें , ये इम्तिहाँ की घड़ी है चलो शराब पीएं ! ग़मो की भीड़ खड़ी है चलो शराब पियें ----- किसी के नाम से आओ संवार ले दुनियां - 3 किसी से-२ आँख लड़ी है चलो शराब पियें ये इम्तिहाँ की घड़ी है चलो शराब पीएं ! ग़मो की भीड़ खड़ी है चलो शराब पियें ----- वो ख़ुद ही आएंगे या हम बुला के लाएंगे , यहीं पे - २ बात अड़ी है चलो शराब पीएं ये इम्तिहाँ की घड़ी है चलो शराब पीएं ! ग़मो की भीड़ खड़ी है चलो शराब पियें ----- अभी जवान हो तुम क्या...

MOHABBAT KARNE WALE KAM NA HONGE_LYRIC_HAFEEZ HOSHIYARPURI

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मोहब्बत करने वाले कम न होंगे तिरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे मोहब्बत करने वाले कम न होंगे ----- ज़माने भर के ग़म या इक तिरा ग़म ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे तिरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे मोहब्बत करने वाले कम न होंगेss  ----- अगर तू इत्तिफ़ाक़न मिल भी जाए तिरी फ़ुर्क़त के सदमे कम न होंगे तिरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे मोहब्बत करने वाले कम न होंगेss  ----- दिलों की उलझनें बढ़ती रहेंगी अगर कुछ मशवरे बाहम न होंगे तिरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे मोहब्बत करने वाले कम न होंगेss  ----- 'हफ़ीज़' उन से मैं जितना बद-गुमाँ हूँ वो मुझ से उस क़दर बरहम न होंगे तिरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे मोहब्बत करने वाले कम न होंगेss  ----- - हफ़ीज़ होशियारपुरी फुरकत - दूरी, विरह  बाह्यम - मिलजुलकर, आपस मे  बदगुमा- खराब, निकम्मा  बरहम - तितर बितर, इधर उधर