सोज़ रखता हूँ मगर साज़ कहाँ से लाऊँ, हाले दिल कहने का अंदाज़ कहाँ से लाऊँ ! अपने जज़्बात में दुनियां को डुबो दूँ लेकिन, तुझसे मिलती हुई आवाज़ कहाँ से लाऊँ !
ये रंगे जुनू जब से इस दरद को भाया है, कुछ याद नहीं रहता क्या खोया क्या पाया है ! हर वक़्त निगाहों में वो जलवा समाया है, हमने तो ख़ुदा अपना इस दिल में बसाया है ! -हज़रत मंज़ूर आलम शाह