ये रंगे जुनू जब से इस दरद को भाया है, कुछ याद नहीं रहता क्या खोया क्या पाया है ! हर वक़्त निगाहों में वो जलवा समाया है, हमने तो ख़ुदा अपना इस दिल में बसाया है ! -हज़रत मंज़ूर आलम शाह
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इन्हे तो आप जानते ही होंगे अगर नहीं तो मैं आपको बता रहा हूँ ये हैं विश्वप्रसिद्ध ग़ज़ल गायिका पीनाज़ मसानी, कानपुर विकास प्राधिकरण के कार्यक्रम में इनके साथ गाने का मौका मिला था | वो याद अभी तक संजो कर रख्खी है | तलत अज़ीज़ के साथ गाया हुआ डुएट "ये बहार कह रही है " यूट्यूब पर सुनिए तब समझ में आएगा
गुरूदेव के चरणों मे नमन : काबा मे भी जलवा है काशी मे नजारा है, हम जिसके पुजारी हैं वो सब का सहारा है ! आँखों मे लगाया है उस कूचए जाना को, उस खाक का हर ज़र्रा इस जान से प्यारा है ! -हज़रत मंज़ूर आलम शाह
दर्द में डूबे हुए मिलते हैं लम्हात कहाँ, जिसकी लज़्ज़त से खुले रूह वो सौग़ात कहाँ, उनसे मिल आऊं तो लेकिन हो मुलाक़ात कहाँ, अपनी जानिब जो नज़र डालूं तो औक़ात कहाँ, हम तो हर तरह से अपने को गुनहगार मिले, फिर भी सोचा है कि कुछ भी हो मगर दिलदार मिले ! -हज़रत मंज़ूर आलम शाह
ऐसा जो कोई यार कहीं हो तो बताऊँ, बाज़ार में मिलता हो तो बाज़ार से लाऊँ, उस शक्ल की तस्वीर बनी हो तो दिखाऊं, तुमको जो तमन्ना है कि मैं भी उसे पाऊं, इस दिल में उतर कर उसे ढूंढ़ो तो मिलेगा, ऐसे नहीं मिलता उसे पूजो तो मिलेगा ! - हज़रत मंज़ूर आलम शाह