ग़ज़ल खिले हैं फूल गुलशन मे तबीयत मुस्कराई है ! बहारों का खज़ाना ले के तेरी याद आई है !! मुझे वो देखते हैं खिड़कियों से झांक लेते हैं ! कुछ ऐसा लग रहा है अब मोहब्बत रंग लाई है !! सुरूर आँखों मे है , दिल मे नशा है पाँव बोझल हैं ! ना जाने किस नज़र से साक़िया तूने पिलाई है !! तेरी महफ़िल मे रौनक़ थी बहुत रौनक़ से पहले भी ! मगर महफ़िल की रौनक़ और रौनक़ ने बढ़ाई है !! - प्रदीप श्रीवास्तव ' रौनक़ '