गीत

✍🏻☃ठंड☃✍🏻

आज ठिठुरती ठंड ने सबकी वाट लगाई है।
घर वाली से ज्यादा हमको अच्छी लगे रजाई है।।

पहन ली फटी कमीज़ हमने अपनी जर्सी के नीचे।
हमारी स्त्री ने हमको बिना इस्त्री की कमीज़ थमाई है।।

ठंडी आह भर कर हमने छोड़ी क्या लम्बी साँस।
सारे कहने लगे इसने,इसने बीड़ी सुलगाई है।।

धुन्ध में यारो जब कुछ भी साफ़ नहीं दिखता।
हर बढ़ते क़दम ने आगे की राह दिखाई है।।

कभी "ऐश"की भी इज्ज़त होगी इस फ़टी कमीज़ सी।
आज पुरानी कमीज़ ने जिस तरहां इज्ज़त पाई है।।
©ऐ🍁अश्वनी कुमार चावला,अनूपगढ़,श्री गंगानगर

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