आदि शंकराचार्य जी

आज पुनः शंकर....

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार पुनः ऐसा कार्य कर दिया है जिसका पुण्य कभी समाप्त नहीं होगा। उन्होंने आज विचार और दर्शन की पूजा की है। 2013 की बाढ़ में क्षतिग्रस्त हुए आदी शंकराचार्य के समाधि स्थल का पुनर्निर्माण...13 फीट ऊंची और 35 टन वजनी...एक ही चट्टान से निर्मित आदी शंकर की प्रतिमा का केदारनाथ में अनावरण...क्यों होना चाहिए था ? क्यों किसी प्रधानमंत्री को ही करना था यह ? क्यों शंकर परमवीर यौद्धा हैं भारत की चेतना के ? क्यों देश के हर नगर-गांव में बताया जाना चाहिए कि शंकर कौन थे ? 
एक केवल 32 वर्ष का जीवन...संसार में सत्य के लिए क्या कर सकता है शंकर का जीवन उसका पर्याय है...बिना कोई तलवार, तीर, बन्दूक के और बिना रक्त की एक भी बूंद बहाए केवल अपनी वाणी, ज्ञान, विचार और दर्शन के बल पर धर्मयुद्ध लड़ा हो, जिसकी विजय पताका आज भी लहरा रही है...जिसने अपनी वाणी से लोगों को यह समझा दिया हो कि तुम गलत हो या नहीं यह तर्क का विषय है लेकिन मैं सत्य ही हूं...
तुम हाथी की सूंड, पांव, पूंछ को छूकर ज्ञान के नाम पर भ्रमित हो आओ भले ही, लेकिन मैं तुम्हें सम्पूर्ण हाथी के दर्शन करा देता हूं...तुम इच्छा को दुखों का कारण मान बैठे हो पर मैं कहता हूं कि किसी भी इच्छा का ना होना भी तुम्हारी एक इच्छा ही है...तुम्हारे सारे प्रश्नों का उत्तर दूंगा तुम्हें प्रश्नरहित कर दूंगा...
क्या दार्शनिक केवल विश्वविद्यालयों में ज्ञान की झूठी जुगाली करने या कॉफी हाउसेज में गप्पबाजी करने के लिए होते हैं ? क्या लेखक, कलाकार, चित्रकार बाल लम्बे कर इंडिया हैबिटैट सेंटर, जवाहर कला केंद्र या जहांगीर आर्ट गैलरी में गूढ़ प्रश्नों के उत्तरों को और उलझा देने के लिए होते हैं ? क्या राजनेता केवल राज करने के लिए होते हैं ? क्या समाज में बदलाव लाने के लिए एनजीओ बनाना आवश्यक है ?
शंकर के जीवन और कृतित्व के पास इन सभी प्रश्नों के उत्तर हैं...भारत में आज जितना सनातन परम्पराओं पर संकट है उससे कहीं अधिक घने काले बादल उस वक्त मंडरा रहे थे जब करीब 1300 वर्ष पहले शंकर केवल 16 वर्ष के थे...सिन्धु तट स्थित केरल के एक सामान्य ब्राह्मण परिवार में जन्म से लेकर केदारनाथ के हिम शिखरों तक आज जो कुछ भी भारतीय चेतना है वो शंकर की ऋणी रहेगी और तब तक ऋणी रहेगी जब तक सूरज चांद और यह धरती रहेंगे...आज अगर आप या मैं अपना नाम ठीक वैसा ही लिख पा रहे हैं जैसा नाम हमारे पूर्वजों ने हमारा रखा था तो यह शंकर का ऋण है, अन्यथा हमारा नाम तक हमें भुला दिया गया था...
संसार के किसी भी धर्म संस्कृति में ऐसा कोई सेवक कभी नहीं हुआ जैसा भारत में शंकराचार्य हुए..वे ना भारत में कहीं राजा बने ना कभी सरपंच बने और ना ही प्रधानमंत्री...ना ही राष्ट्रपिता या राष्ट्रपुत्र जैसी अजीब उपाधियों से उनका सत्कार किया गया...ना ही वे पदम श्री हैं और ना भारत रतन...ना उनके नाम पर कोई स्टेडियम, अस्पताल या विश्वविद्यालय है...लेकिन इस धरती से लगभग मिटा दिए गए धर्म का दीपक अब तक सवा सौ करोड़ से अधिक हृदयों में प्रज्जवलित है तो वो शंकर के कारण है, जिसने नन्हीं सी आयु में उस दीपक में ऐसा घृत डाला कि वो अखंड ज्योत आज तक प्रकाशवान है...
इस देश की सभी शंकाओं का शमन करने वाले शंकर को बारंबार प्रणाम.....जुग जुग जिए शंकर

जय_हिंदू_राष्ट्र

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