NAZAR MUJHSE MILATI HO_LYRIC_HASRAT JAIPURI
NAZAR MUJHSE MILATI HO_AHMAD HUSHAIN MOHD. HUSAIN
नज़र मुझसे
मिलाती हो तो तुम शरमा-सी जाती हो,
इसी को
प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं } 2
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जबाँ ख़ामोश है
लेकिन निग़ाहें बात करती हैं – 2
अदाएँ
लाख भी रोको, अदाएँ बात
करती हैं
नज़र
नीची, किए दाँतों, में उँगली को दबाती हो
इसी को
प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं
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छुपाने से मेरी
जानम, कहीं क्या
प्यार छुपता है – 2
ये ऐसा
मुश्क है ख़ुशबू, हमेशा देता
रहता है
तुम तो
सब जानती हो, फिर भी तुम मुझको सताती हो
इसी को
प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं
!
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तुम्हारे प्यार
का ऐसे हमें इज़हार मिलता है – 2
हमारा
नाम सुनते ही, तुम्हारा रंग खिलता है
और फिर साज़-ए-दिल पर तुम,
हमारे गीत गाती हो
इसी को
प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं
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तुम्हारे घर
में जब आऊँ, तो छुप जाती हो परदे में – 2
मुझे
जब देख ना पाओ तो घबराती हो परदे में
ख़ुद ही चिलमन, उठा कर फिर, इशारों से बुलाती हो
इसी को प्यार
कहते हैं,
इसी को
प्यार कहते हैं।
नज़र मुझसे
मिलाती हो तो तुम शरमा-सी जाती हो,
इसी को
प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं - } 2
~ हसरत जयपुरी

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