HUZUR SAHEB KI SHAYARI
दर्द में डूबे हुए मिलते हैं लम्हात कहाँ,
जिसकी लज़्ज़त से खुले रूह वो सौग़ात कहाँ,
उनसे मिल आऊं तो लेकिन हो मुलाक़ात कहाँ,
अपनी जानिब जो नज़र डालूं तो औक़ात कहाँ,
हम तो हर तरह से अपने को गुनहगार मिले,
फिर भी सोचा है कि कुछ भी हो मगर दिलदार मिले !
-हज़रत मंज़ूर आलम शाह
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