ROOH-E-SHAYARI 07.08.2020


1

ऐ मेरे जुर्म गिनाने वाले दोस्त

तेरे घर कोई आइना है क्या

2

 पिता हारकर बाज़ी हमेशा मुस्कुराया

शतरंज की उस जीत को मैं अब समझ पाया

3

जब भी फुरसत मिली हंगामा-ए-दुनिया से

मेरी तन्हाई को तेरा पता याद आया

4

 बारिश की बूंदों में झलकती है उनकी तस्वीर

आज फिर भीग बैठे तुम्हें पाने की चाहत में

5

 इश्क़ का उम्र से, कोई लेना देना नही साहब,

ये वो शै है जितनी पुरानी उतनी नशीली !

6

 शहर उमड़ा होगा उसे देखने को

पर उसे मलाल रहेगा कि हम नहीं आये

7

इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिंता से हृदय धड़कता था

थे बुरे शकुन घर से चलते ही, दांया हाथ फड़कता था 

मैंने सवाल जो याद किए, वे केवल आधे याद हुए

उनमें से भी कुछ स्कूल तकल, आते-आते बर्बाद हुए 

तुम बीस मिनट हो लेट द्वार पर चपरासी ने बतलाया

मैं मेल-ट्रेन की तरह दौड़ता कमरे के भीतर आया

पर्चा हाथों में पकड़ लिया, आंखें मूंदीं टुक झूम गया

पढ़ते ही छाया अंधकार, चक्कर आया सिर घूम गया

उसमें आए थे वे सवाल जिनमें मैं गोल रहा करता

पूछे थे वे ही पाठ जिन्हें पढ़ डांवाडोल रहा करता

यह सौ नंबर का पर्चा है, मुझको दो की भी आस नहीं

चाहे सारी दुनिय पलटे पर मैं हो सकता पास नहीं 

ओ! प्रश्न-पत्र लिखने वाले, क्या मुंह लेकर उत्तर दें हम

तू लिख दे तेरी जो मर्ज़ी, ये पर्चा है या एटम-बम 

तूने पूछे वे ही सवाल, जो-जो थे मैंने रटे नहीं

जिन हाथों ने ये प्र

8

 नया  मकान बनाया  है उसके बेटे ने,

पुरानी मेज़ सा वो भी है एक कोने मेँ ।

असद अजमेरी

9

 पूछा अगर किसी ने मिरा आके हाल-ए-दिल ,

बे-इख़्तियार आह लबों से निकल गई .

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

10

 काश के होता ये दिल पत्थर का यारों

 खुद घायल हो जाते चोट पहुंचाने वाले

11

 दिल तो रोज सजता है एक नादान दुल्हन की तरह

और  गम रोज चले आते हैं बाराती बन कर

12

कब तक मिलती पनाह हमें बहुत भीड़ थी उसके दिल में

हम खुद ना निकलते तो निकाल दिए जाते

13

 शरारे हैं पोशीदा मेरी हँसी में

कहो तो हँसूं ..और दुनिया जला दूं..

14

 Zameer jinda rskh Kabir jinda rskh

Sultan bhi bn jaye toh fakeer Jinda rakh

15

 मैं बे-पनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ ,

मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं।

16

 ये सत्य है कि,भीड़ में सभी

अच्छे लोग नहीं होते लेकिन.

एक सच्चाई ये भी है कि,अच्छे

लोगों की भीड़ नहीं होती..

17

घटाएं आ लगीं हैं आसमां पे, दिन सुहाने हैं..

मेरी मजबूरी मुझे बारिश में भी काग़ज़ कमाने हैं

18

 सोचकर बाजार गया था आपने कुछ आंसू बेचने

हर खरीदार बोला अपनों के दिए तोहफ़े बेचा नहीं करते

19

 मेरी गुस्ताखियों को तुम माफ़ करना ऐ दोस्त,

मै तुम्हें तुम्हारी इजाजत के बिना भी याद करता हूँ...

20

कौन कहता है,वक्त बहुत तेज है

तुम कभी किसी का,इंतजार तो करके देखों

21

वो देखें तो उनकी इनायत ना देखें तो रोना क्या,

जो दिल गैर का हो उसका होना क्या और ना होना क्या

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