ROOH-E-SHAYARI ( आज की शायरी )


1
मुझे एक ऐसा शख्स चाहिए
जो खोने से मुझे डरता हो
2
मुझ में बेपनाह मुहब्बत के सिवा कुछ भी नही,
तुम अगर चाहो तो मेरी साँसो की तलाशी ले लो
3
छोड़िए शिकायत शुक्रिया अदा कीजिये
जितना है पास पहले उसका मजा लीजिये
अपनी उम्र का मज़ा लिजिये.
4
एक सफ़र यूं भी हुआ आग़ाज़ से अंजाम तक !
हम तुम्हारे नाम से पहुंचे तुम्हारे नाम तक !!
आप की मख़मूर आँखें आबरू-ए-मैकदा !
रक्स करता है खयाले हज़रते ख़य्याम तक !!
~ सुधीर बेकस
5
मौका जिसे भी मिलता है पीता ज़रूर हैं..
शायद मिठास बहुत हमारे खून में है....
6
वो सितारा जो गिरा टूट कर ऊंचाइयों से,
किसी ज़र्रे की हंसी उसने उड़ाई होगी ।।
7
वाह मौसम तेरी वफा पे आज दिल खुश हो गया
याद-ए-यार मुझे आयी और बरस तू पड़ा
8
तेरे बदलने का कोई दु:ख नहीं
मैं अपने ऐतबार पर शर्मिन्दा हूं
9
मुझे  राह  से  कौई   उठा  ले  गया !
निगाहों   में  अपनी  बसा  ले  गया !!
   थी  आरजू  पाने  की  जो  हमें !
वही  दिल  में  अपने  दबा  ले गया !!
~लक्ष्मण दावानी
10
लोग कहते हैं कि हम मुस्कुराते बहुत हैं,
और हम थक गए अपना दर्द छुपाते छुपाते
11
तेरा न होना, मेरे होने पे भारी है
पर जिये जाने की रस्म जारी है
12
बहे ज़मीन पे जो मेरा लहू तो ग़म मत कर !
इस ज़मीन से महकते गुलाब पैदा कर !!
तू इंक़लाब की आमद का इंतज़ार न कर !
जो हो सके तो अभी इन्क़लाब पैदा कर !!
- मजाज़ लखनवी
13
अजीब शर्त रखी दिलदार ने मिलने की
सूखे पत्तों पर चलकर आना है और आवाज भी न हो।
14
मैं हुस्न हूँ मेरा रूठना लाजमी है,
तुम इश्क हो ज़रा अदब में रहा करो |
15
तेरे हुस्न से मिली है मेरे इश्क को शोहरत
मुझे जानता ही कौन था तेरी आशिकी से पहले
16
सुन लो ए हवाओ,चिरागों को छोड़ दो तन्हा..
जो अपने आप ही जल रहे है, उन्हें और क्या है आज़माना..
17
लगा कर उसने आज हाथों में मेंहदीं कमाल कर डाला
कुछ चाहनें वाले मयखानें गये कुछ ने शहर ही बदल डाला
18
लफ़्ज़ों को आज मैं, कागज़ में उतार दूं,,
जज़्बात कुछ तरह, स्याही में डाल दूं,,
इक अक्स उभर आता है, स्याही के आईने में,,
गहरे हुए ज़ख़्मों पे जरा,सफहों की चादर डाल दूं,,
ठहर जाती है जब कलम,लफ्ज़ों के सन्नाटे को देखकर,,
क्यूं ना खामोश हुई नज़्मों को,,
बेखुदी की परवाज़ दूं.....
17
एक कदम भी ना उठता तेरी राह मे,
मैं अगर राह का फासला देखता।
वसीम बरेलवी।।
18
खुद कुशी हराम है साहब,
मेरी मानो तो इश्क कर लो।
19
निकलता हूं मैंखाने से पूरे होशो हवास में
गुजरता हूं उनकी गली से तो लड़खड़ा जाता हूं मैं
20
सौ बार मरना चाहा उनकी निगाहों में डूब के,
वह हर बार निगाहें झुका लेते हैं, मरने भी नहीं देते
21
बातों की मिठास अंदर का भेद नहीं खोलती साहब
मोर को देख के कौन कहता है की ये सांप खाता होगा

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